एक बार अवश्य पढ़ें... ��������इतिहास झिंतड़ा का��������
आचार्य प्रवर जगतगुरु स्वामी रामानंद जी महाराज – आदि संस्थापक स्वामी श्री सुरासुरानंद जी महाराज स्वामी श्री गाधवानंद जी महाराज स्वामी श्री गरीबनंद जी महाराज स्वामी श्री लक्ष्मीदास जी महाराज स्वामी श्री गोपाल दास जी महाराज स्वामी श्री नरसिंह दास जी महाराज स्वामी श्री कुबा जी महाराज (मारवाड में ग्राम झीथडा दारा गादी आचार्य पीठ के संस्थापक)
स्वामी श्री गरीब दास जी महाराज (महाराष्ट्र के भंडार जिले में पवनी मठ कें संस्थापक)
स्वामी श्री बलभद्र दास जी महाराज (रायपुर के दुधाधारी मठ के संस्थापक)
स्वामी श्री बलभद्र दास जी महाराज का जन्म जोधपुर (मारवाड) में सरस्वती नदी के तट पर आनंदपुर (कालु) नामक गांव में एक वैदिक ब्राम्हण पंडित शंभुदयाल जी के घर में संवत् 1580 सन् 1523 के लगभग हुआ था. इनके जन्म के समय में राजयोग. सिद्धयोग. सौभाग्योग उच्चग्रह आदि बडे ही विलक्षण ग्रह योग पडे थे । इनका नाम ‘’बालमुकुन्द’’ रखा गया । इनकी जन्मकुण्डली में पता चला की दसवें वर्ष में मारकेश होने के कारण आकाल मृत्यु योग है । जैसे ही बालक ने दसवें वर्ष में प्रवेश किया तो उसे भंयकर बिमारी ने घेर लिया. किसी भी प्रकार के उपचार से ठीक नहीं हो सका. और ऐ दिन आचनक बेहोश हो गय. नाडी भी धिमी पडने लगी. तब पं. शंभुदयाल जी घबराये हुए झीथडा गये और स्वामी कुबाजी महाराज के शिष्य गरीबदास जी महाराज को लेकर आये ।बच्चे को देखकर गरीब दास जी ने शंभुदयाल जी से कहा पंडित जी । यदि आप बच्चे का जीवन चाहते हो तो इसे भगवान के चरणों में समर्पित कर दीजिए । स्थिति के विकटता को समझते हुए विद्धान कर्मकाण्डी पिता ने अविलंब ही हाथ में जल लेकर सविधि संकल्प करके पुत्र बालमुकुंद को इश्वर के चरणों में डाल दिये. पश्चात् गरीबदास जी ने बालक के मुख में चरणामृत डालकर श्री राम नाम से झाडा किया. तो तुरंत चेतना आ गयी तथा सारी व्याधियां भी एकदम समाप्त हो गया । संकल्प के अनुसार माता – पिता बालक को लेकर गरीबदास जी के साथ झीथडा गादी पहुंचे तथा स्वामी कुबा जी महाराज (मठाधीश झीथडा गादी) के चरणों में डाल दिये । श्री कुबा जी महाराज ने अपने शिष्य गरीब दास जी के द्धारा बालक बालमुकुनंद को श्री रामानन्द संप्रदाय की सदाचार पद्धति के अनुसार संस्कार पूर्वक राम नाम मंत्र की दीक्षा दिला दी तथा बालक का नाम बालमुकुन्द से बलभद्र दास रखा गया । बालक बलभद्र दास गुरु चरणों में रहकर अल्प समय में ही संपूर्ण शास्त्रों की शिक्षा ग्रहण कर अपने तपोबल से अलौकिक सिद्धि प्राप्त कर लिये । श्री कुबा जी महाराज के बाद उसके शिष्य श्री गरीब दास जी झीपडा गादी के प्रमुख बने तो उन्होंने पवनी (भंडार जिला महाराष्ट्र) में एक आचार्य पीठ की स्थापना कर अपने प्रिय शिष्य श्री बलभद्र दास जी को पूरे गोडवाना क्षेत्र में श्री राम भक्ति प्रचार के कार्य में नियुक्ति कर दिया । गुरु की आज्ञानुसार श्री बलभ्रद्र दास जी महाराष्ट्र व छ.ग. में प्रवचन उपदेश देने लगे । उनके प्रवचन उपदेश से प्रभावित भोंसला मराठों ने उन्हे अपना गुरु बना लिया । भरतसिंह राजपुरोहित झिंतड़ा ��������������������
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आचार्य प्रवर जगतगुरु स्वामी रामानंद जी महाराज – आदि संस्थापक
स्वामी श्री सुरासुरानंद जी महाराज
स्वामी श्री गाधवानंद जी महाराज
स्वामी श्री गरीबनंद जी महाराज
स्वामी श्री लक्ष्मीदास जी महाराज
स्वामी श्री गोपाल दास जी महाराज
स्वामी श्री नरसिंह दास जी महाराज
स्वामी श्री कुबा जी महाराज
(मारवाड में ग्राम झीथडा दारा गादी आचार्य पीठ के संस्थापक)
स्वामी श्री गरीब दास जी महाराज
(महाराष्ट्र के भंडार जिले में पवनी मठ कें संस्थापक)
स्वामी श्री बलभद्र दास जी महाराज
(रायपुर के दुधाधारी मठ के संस्थापक)
स्वामी श्री बलभद्र दास जी महाराज का जन्म जोधपुर (मारवाड) में सरस्वती नदी के तट पर आनंदपुर (कालु) नामक गांव में एक वैदिक ब्राम्हण पंडित शंभुदयाल जी के घर में संवत् 1580 सन् 1523 के लगभग हुआ था. इनके जन्म के समय में राजयोग. सिद्धयोग. सौभाग्योग उच्चग्रह आदि बडे ही विलक्षण ग्रह योग पडे थे । इनका नाम ‘’बालमुकुन्द’’ रखा गया । इनकी जन्मकुण्डली में पता चला की दसवें वर्ष में मारकेश होने के कारण आकाल मृत्यु योग है । जैसे ही बालक ने दसवें वर्ष में प्रवेश किया तो उसे भंयकर बिमारी ने घेर लिया. किसी भी प्रकार के उपचार से ठीक नहीं हो सका. और ऐ दिन आचनक बेहोश हो गय. नाडी भी धिमी पडने लगी. तब पं. शंभुदयाल जी घबराये हुए झीथडा गये और स्वामी कुबाजी महाराज के शिष्य गरीबदास जी महाराज को लेकर आये ।बच्चे को देखकर गरीब दास जी ने शंभुदयाल जी से कहा पंडित जी । यदि आप बच्चे का जीवन चाहते हो तो इसे भगवान के चरणों में समर्पित कर दीजिए । स्थिति के विकटता को समझते हुए विद्धान कर्मकाण्डी पिता ने अविलंब ही हाथ में जल लेकर सविधि संकल्प करके पुत्र बालमुकुंद को इश्वर के चरणों में डाल दिये. पश्चात् गरीबदास जी ने बालक के मुख में चरणामृत डालकर श्री राम नाम से झाडा किया. तो तुरंत चेतना आ गयी तथा सारी व्याधियां भी एकदम समाप्त हो गया । संकल्प के अनुसार माता – पिता बालक को लेकर गरीबदास जी के साथ झीथडा गादी पहुंचे तथा स्वामी कुबा जी महाराज (मठाधीश झीथडा गादी) के चरणों में डाल दिये । श्री कुबा जी महाराज ने अपने शिष्य गरीब दास जी के द्धारा बालक बालमुकुनंद को श्री रामानन्द संप्रदाय की सदाचार पद्धति के अनुसार संस्कार पूर्वक राम नाम मंत्र की दीक्षा दिला दी तथा बालक का नाम बालमुकुन्द से बलभद्र दास रखा गया । बालक बलभद्र दास गुरु चरणों में रहकर अल्प समय में ही संपूर्ण शास्त्रों की शिक्षा ग्रहण कर अपने तपोबल से अलौकिक सिद्धि प्राप्त कर लिये । श्री कुबा जी महाराज के बाद उसके शिष्य श्री गरीब दास जी झीपडा गादी के प्रमुख बने तो उन्होंने पवनी (भंडार जिला महाराष्ट्र) में एक आचार्य पीठ की स्थापना कर अपने प्रिय शिष्य श्री बलभद्र दास जी को पूरे गोडवाना क्षेत्र में श्री राम भक्ति प्रचार के कार्य में नियुक्ति कर दिया । गुरु की आज्ञानुसार श्री बलभ्रद्र दास जी महाराष्ट्र व छ.ग. में प्रवचन उपदेश देने लगे । उनके प्रवचन उपदेश से प्रभावित भोंसला मराठों ने उन्हे अपना गुरु बना लिया ।
भरतसिंह राजपुरोहित झिंतड़ा
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